क्या यही हैँ हमारी ज़िन्दगी - अरुणाभ पाल




 सुबह सुबह नींद खुली 

आँखों में भर कर पानी, 

एक नये दिन की शुरुवात 

और एक नयी परेशानी ll


सोचता हूँ... 

             कहा से लाऊ दो बक़्त का खाना 

कैसे समझाऊ बच्चो को की खिलोनो के लिए मत रोना 

एक अहसास भरी दिल से घर से निकलना 

        और फिर खाली हाथ लौटना ll


अंदर से पुकारे बीबी,... ओ जी 

क्या आपको सुनाई नहीं दी  बच्चो का रोना? 

मुझे पता ना चला, क्या भूख थी इसकी बजह, 

             या थी खिलौना??? 

 

अब फिर क्या?... 

        घर घर में धक्के खाना, 

      काम करके भी गालिया सुनना, 

      दो बक़्त का खाना ना मिलना, 

      और फिर खाली हाथ बापस आना ll

  

दूर से देखा तो, 

    बीबी कर रही थी इंतजार l

सोचा क्या घर जाऊ, 

    और स्वीकार लू अपना हार?


फिर बही, 

     उदाश भरी दिल से घर जाना, 

     बीबी का मुझ पर रूठना, 

     बच्चो को झूठा दिलाशा देना, 

     और भूके पेट सो जाना ll

 

सो कर भी नींद नहीं आता, 

    अगले सुबह की चिंता मुझे रुलाता, 

खुद ही खुद से सवाल पूछता, 

    क्या यही हैँ हमारी जिंदगी???